(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.47. अध्यायः 047
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
कृष्णंयुधिष्ठिरादीनां कुरुक्षेत्रंप्रति गमनम्॥ 1॥ युधिष्ठिरेण कृष्णंप्रति परशुरामचरित्रकथनप्रार्थना॥ 2॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच। 12-47-0x(5439)(66602)
ततः स च हृषीकेशः स च राजा युधिष्ठिरः।
कृपादयश्च ते सर्वे चत्वारः पाण्डवाश्च ते॥ 12-47-1(66603)
रथैस्तैर्नगरप्रख्यैः पताकाध्वजशोभितैः।
ययुराशु कुरुक्षेत्रं वाजिभिः शीघ्रगामिभिः॥ 12-47-2(66604)
तेऽवतीर्य कुरुक्षेत्रे केशमढज्जास्थिसंकुले।
देहन्यासः कृंतो यत्र क्षत्रियैस्तैर्महारथैः॥ 12-47-3(66605)
गजाश्वदेहास्थिचयैः पर्वतैरिव संचितम्।
नरशीर्षकपालैश्च हंसैरिव च सर्वशः॥ 12-47-4(66606)
चितासहस्रैर्निचितं वर्मशस्त्रसमाकुलम्।
आपानभूमिं कालस्य तदा भुक्तोज्झितामिव॥ 12-47-5(66607)
भूतसङ्घानुचरितं रक्षोगणनिषेवितम्।
पश्यन्तस्ते कुरुक्षेत्रं ययुराशु महारथाः॥ 12-47-6(66608)
गच्छन्नेव महाबाहुः सर्वं यादवनन्दनः।
युधिष्ठिराय प्रोवाच जामदग्न्यस्य विक्रमम्॥ 12-47-7(66609)
अमी रामह्रदाः पञ्च दृश्यन्ते पार्थ दूरतः।
येषु संतर्पयामास पितॄन्क्षत्रियशोणितैः॥ 12-47-8(66610)
त्रिःसप्तकृत्वो वसुधां कृत्वा निःक्षत्रियां प्रभुः।
इहेदानीं ततो रामः कर्मणो विरराम ह॥ 12-47-9(66611)
युधिष्ठिर उवाच। 12-47-10x(5440)
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी कृता निःक्षत्रिया पुरा।
रामेणेति यदात्थ त्वमत्र मे संशयो महान्॥ 12-47-10(66612)
क्षत्रबीजं यथा दग्धं रामेण यदुपुङ्गव।
कथं भूयः समुत्यत्तिः क्षत्रस्यामितविक्रम॥ 12-47-11(66613)
महात्मना भगवता रामेण यदुपुङ्गव।
कथमुत्सादित्तं क्षत्रं कथमृद्धिगतं पुनः॥ 12-47-12(66614)
महता रथयुद्धेन कोटिशः क्षत्रिया हताः।
तथाऽभूच्च मही कीर्णा क्षत्रियैर्वदतां वर॥ 12-47-13(66615)
किमर्थं भार्गवेणेदं क्षत्रमुत्सादितं पुरा।
रामेण यदुशार्दूल कुरुक्षेत्रे महात्मना॥ 12-47-14(66616)
एतन्मे छिन्धि वार्ष्णेय संशयं तार्क्ष्यकेतन।
आगमो हि परः कृष्ण त्वत्तो नो वासवानुज॥ 12-47-15(66617)
वैशम्पायन उवाच। 12-47-16x(5441)
ततो व्रजन्नेव गदाग्रजः प्रभुः
शशंस तस्मै निखिलेन तत्त्वतः।
युधिष्ठिरायाप्रतिमौजसे तदा
यथाऽभवत्क्षत्रियसंकुला मही॥ ॥ 12-47-16(66618)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मपर्वणि सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः॥ 47॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-47-15 आगमो वेदः। त्वत्तः त्वद्वचनात्रो परः नाधिकः॥


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